क्या आपका लोन सिर्फ इसलिए रिजेक्ट हो जाता है क्योंकि आपका सिबिल स्कोर (CIBIL Score) थोड़ा कम है? क्या आप ‘न्यू-टू-क्रेडिट’ हैं, यानी आपका कोई क्रेडिट इतिहास ही नहीं है और बैंक आपको दरवाज़े से ही लौटा देते हैं? अगर हाँ, तो अब आपके लिए राहत की खबर है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने ऋण देने की प्रक्रिया को लेकर कुछ ऐसे निर्देश जारी किए हैं, जिससे लाखों लोगों के लिए लोन पाने का रास्ता खुल सकता है।
यह कोई छोटी-मोटी घोषणा नहीं है, बल्कि यह बैंकिंग सिस्टम में एक बड़े बदलाव का संकेत है। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्या हैं ये नए नियम और इसका आप पर क्या असर पड़ेगा।
क्या है RBI का नया रुख और क्यों यह एक गेम-चेंजर है?
अब तक बैंक और NBFC (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ) लोन देने के लिए मुख्य रूप से सिर्फ आपके CIBIL या क्रेडिट स्कोर पर निर्भर रहते थे। अगर स्कोर 750 से कम है, तो लोन मिलना लगभग नामुमकिन सा हो जाता था। लेकिन RBI ने अब इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
RBI के नए दिशा-निर्देशों के मुख्य बिंदु:
- सिर्फ क्रेडिट स्कोर ही अंतिम सत्य नहीं: RBI ने साफ किया है कि किसी व्यक्ति का लोन आवेदन केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका क्रेडिट स्कोर कम है या शून्य है। बैंकों को अब आवेदक की पूरी वित्तीय प्रोफाइल देखनी होगी। इसमें आपकी आय, नौकरी की स्थिरता, बैंक खाते में लेन-देन और भविष्य में लोन चुकाने की क्षमता जैसे अन्य महत्वपूर्ण कारक शामिल होंगे।
- ‘न्यू-टू-क्रेडिट’ ग्राहकों को मिलेगा मौका: भारत में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनका कोई क्रेडिट इतिहास ही नहीं है, क्योंकि उन्होंने कभी लोन या क्रेडिट कार्ड नहीं लिया। ऐसे लोगों को बैंक ‘जोखिम भरा’ मानकर लोन नहीं देते थे। RBI के नए नियमों के अनुसार, अब इन ग्राहकों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। बैंकों को इन्हें भी लोन देने के लिए एक उचित प्रणाली बनानी होगी।
- वैकल्पिक डेटा का होगा इस्तेमाल: अब बैंक केवल आपके पुराने लोन के आधार पर आपको नहीं परखेंगे। वे आपकी लोन चुकाने की क्षमता का आकलन करने के लिए अन्य डेटा का भी उपयोग कर सकते हैं, जैसे:
- आपके बिजली और पानी के बिल का समय पर भुगतान।
- मोबाइल पोस्टपेड बिल का भुगतान।
- इंश्योरेंस प्रीमियम का नियमित भुगतान।
- आपकी आय और बचत का पैटर्न।
- पारदर्शिता और सही कारण बताना अनिवार्य: अगर कोई बैंक या NBFC आपका लोन आवेदन खारिज करता है, तो उसे अब केवल “कम सिबिल स्कोर” कहकर पल्ला झाड़ने की इजाजत नहीं होगी। उन्हें लिखित में या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आवेदन खारिज करने का स्पष्ट और ठोस कारण बताना होगा। यह आपके लिए एक बड़ी ताकत है, क्योंकि इससे आपको पता चलेगा कि असल समस्या कहाँ है।
कम सिबिल स्कोर वालों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस बदलाव का सीधा फायदा उन लोगों को मिलेगा जो अब तक सिस्टम से बाहर थे:
- बढ़ी हुई उम्मीद: अगर आपका स्कोर 600-700 के बीच है और आपकी आय स्थिर है, तो अब आपके लोन अप्रूव होने की संभावना काफी बढ़ गई है।
- बेहतर मोलभाव की शक्ति: अब आप बैंक से बात करते समय अपनी स्थिर आय, समय पर बिल भुगतान जैसी अच्छी वित्तीय आदतों को सामने रखकर एक मजबूत दावा पेश कर सकते हैं।
- जोखिम-आधारित ब्याज दरें (Risk-Based Interest Rates): हो सकता है कि आपको बहुत अच्छे सिबिल स्कोर वाले व्यक्ति की तुलना में थोड़े ज़्यादा ब्याज दर पर लोन मिले, लेकिन ‘लोन न मिलने’ से ‘थोड़ा महंगा लोन मिलना’ कहीं बेहतर विकल्प है।
लोन की संभावना बढ़ाने के लिए आप क्या करें?
RBI के नियम आपके पक्ष में हैं, लेकिन आपको भी अपनी तरफ से पूरी तैयारी रखनी चाहिए:
- डॉक्यूमेंट्स तैयार रखें: अपनी सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट (पिछले 6-12 महीने का), इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) और पहचान पत्र जैसे सभी दस्तावेज़ तैयार रखें।
- आय का स्रोत दिखाएं: अगर आपकी स्थिर नौकरी या व्यापार है, तो इसे प्रमुखता से बताएं। यह आपके लोन चुकाने की क्षमता को साबित करता है।
- छोटी शुरुआत करें: अगर आपका कोई क्रेडिट स्कोर नहीं है, तो एक छोटा कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन (जैसे मोबाइल या फ्रिज के लिए) या एक बेसिक क्रेडिट कार्ड लेकर और उसका समय पर भुगतान करके अपना स्कोर बनाना शुरू करें।
- अपनी क्रेडिट रिपोर्ट जांचें: साल में एक बार अपनी क्रेडिट रिपोर्ट मुफ्त में ज़रूर जांचें। कई बार गलतियों की वजह से भी स्कोर कम हो जाता है, जिसे आप ठीक करवा सकते हैं।
निष्कर्ष:
RBI का यह कदम वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला है। यह सुनिश्चित करेगा कि लोन कुछ चुनिंदा लोगों तक ही सीमित न रहे, बल्कि हर उस व्यक्ति को मिले जो उसे चुकाने की क्षमता रखता है। तो, अगर कम सिबिल स्कोर आपकी चिंता का कारण था, तो अब राहत की सांस लीजिए, अपनी तैयारी पूरी कीजिए और एक नए आत्मविश्वास के साथ लोन के लिए आवेदन करें!
Disclaimer: लोन देना या न देना, ब्याज दर तय करना और लोन की राशि निर्धारित करना बैंक या NBFC का अंतिम निर्णय होता है, जो उनके आंतरिक जोखिम मूल्यांकन मानदंडों पर निर्भर करेगा। RBI के निर्देश इस प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए हैं।